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Biography of Parveen Shakir and her ghazals in hindi

दिल के उन जज़्बातों को जो महसूस तो अक्सर हर कोई करता है, मगर उनके पास कभी अल्फ़ाज़ यानी के शब्द नहीं होते तो कभी उनके पास उनको करिने से सजाकर कहना या लिखना नहीं आता।  ये दोनों हुनर जिसके पास है, उनको शायर कहते हैं. ऐसा नहीं की शायरी पर मर्दों की ही हुक्मरानी रही है, सदियों से मगर बहुत बड़े पैमाने पर अगर देखा जाए तो या कहा जा सकता है की, शायरी पर कब्जा हमेशा मर्द शायरों का रहा है। मगर दिल तो औरतों के पास भी होता है, और वो भी उनही सब जज़्बातों से दो चार होती हैं। जिनसे मर्द हुआ करते हैं, और यही जज़्बात जब किसी औरत के दिल में उठते हैं तो वो भी शायरी करती है, और जब वो खुद शायरी करती है तो फिर शायरी मे एक नया दर्द एक नया पहलू नज़र आता है. ज़िंदगी का इसी अंदाज़ की एक शायरा हुई नाम था उनका परवीन शाकिर. एक छोटी सी उम्र मे जो मुकाम परवीन शाकिर को हासिल हुआ उनकी शायरी के ज़रिये वो कबील-ए-तारीफ है.                                     


परवीन शाकिर और उनकी ज़िंदगी


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Image Courtesy by -.bolnetwork.com


अक्सर ये कहा जाता है की, शायर बनते नहीं शायर पैदा होते हैं क्योंकि, शायर के सिने में जो दिल धड़कता है वो आम इंसान के दिल से कहीं शायद ज़्यादा धड़कता है। वो हर खास बात में आम बात और हर आम बात में खास बातें ढूंढ लिया करता है, जब ज़मीन में बीज डाला जाता है। वो उसी वक़्त से उस बीज को पौधे के तौर पर देखने लगता है, वो उसी वक़्त उस पौधे को एक पेड़ की तरह महसूस करने लगता है। उस पेड़ में लगे फलों की लज़्ज़त भी उसकी ज़बान महसूस कर सकती है, कुछ इस क़िस्म और मिजाज़ के होते हैं शायर.

            परवीन शाकिर की पैदाइश 24 नवम्बर 1952 के दिन शाकिर हुसैन साहब के घर पाकिस्तान के कराची के सिंध इलाके में हुई, बचपना परवीन का कराची में ही गुज़रा वो बचपन से ही पढ़ने में काफी अच्छी थीं, कराची के सर सय्यद कॉलेज से उन्होने इंटरमिडियट तक की पढ़ाई की. वो आगे और पढ़ाई करना चाहतीं थीं, पढ़ाई में काफी अच्छी थीं तो घर वालों ने भी उन्हे पढ़ने दिया। लिहाजा उन्होने कराची के जामिया से एम.ए अंग्रेज़ी की डिग्री ली, फिर बैंक एड्मिनिसट्रेशन में एम.ए की डिग्री ली, और पी.एच.डी की डिग्री भी ली सन 1982 में उन्होने Central Superior Services Examination को भी पास किया उसके बाद सन 1991 में हॉवर्ड विश्वविद्यालय उस से Public Administration में M. A. की डिग्री ली.

            परवीन शाकिर की शादी नासिर अली से हुई थी, वो पेशे से डॉक्टर थे मगर बहुत दिनों तक दोनों का साथ न रह सका। क्या पता शायरों के साथ क्या बात है ? की किसी से उनकी तबीयत मिलती नहीं वो दुनियाँ को जिस नज़रिये से देखते हैं, दुनियाँ उस नज़र से शायरों को नहीं देख पाती। जिसकी वजह से उनको अपनी ज़िंदगी में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, और अक्सर शादी शुदा शायरों की ज़िंदगी में देख गया है की, उनकी शादी बहुत दिनों तक नहीं रह पाती, यही हुआ परवीन के साथ भी उनकी शादी भी तालक पर आके ख़त्म हुई। इस शादी से उनको एक लड़का भी था जिसका नाम रखा गया था मुराद अली.

परवीन शाकिर की शायरी का अंदाज़


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Image Courtesy by - Daily Times


परवीन शाकिर की शायरी में वो दर्द साफ दिखाई देता है, जो उन्हे ज़िंदगी ने उनको दिये नज़ाकत नर्म लहजा उनकी शायरी और उनके शख्सियत की खासियत थी, ये सब मिल कर उनकी शायरी एक अलग सी दिल आवेज़ शक्ल अख़्तियार कर लेती थी. जो आज भी सुनने वालों के दिल में एक खास किस्म रूहानी जज़्बात को पैदा करती है, उनकी शायरी में एक औरत अकसर नज़र आती है, जो अपने टूटे हुए दिल से आवाज़ देती है, जिसके दिल में दर्द तो है मगर वो उस वक़्त भी खुद्दार है.

             उनकी ग़ज़लों को एक किताब की शक्ल दी गई, और उसका नाम था खुश्बु जो की, सन 1976 में आई अपनी पहली किताब से ही वो मशहूर हो गईं शायरी की दुनियाँ में। उसके बाद सदबर्ग आई जो की सन 1980 में आई ख़ुद कलामी जो की 1990 में और इसी सन में आई इनकार फिर आई माह-ए-तमाम सन 1994 में.

परवीन शाकिर का अचानक चले जाना 


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Image Courtesy by - wikipidia


परवीन शाकिर का दर्द भी था, उनकी ज़िंदगी भी थी, जिसके आसपास वो अपनी शायरी बुनती रहतीं थी। और अपने फर्ज़ को भी अंजाम देती रहती थीं. इसी तरह गुज़र रही थी ज़िंदगी मगर फिर हुआ यूं की एक सर्द सुबह। अभी लोग क्रिसमस की खुमारी में ही थे की, 26 दिसम्बर 1994 के दिन इस्लामाबाद की एक सड़क पर वो अपनी सरकारी गाड़ी से अपने दफ्तर की ओर जा रही थीं. वो पीछे कार के बैठी हुई थीं और ड्राइवर कार चला रहा था. दूसरी तरफ से आती एक गाड़ी से इनकी कार की ज़बरदस्त टक्कर हुई और एक अज़ीम शायरा अपनी किसी नज़्म की तरह ख़त्म हुईं. बाद में उस सड़क का नाम परवीन शाकिर के नाम पर रखा गया।
वो अपने जमाने में शायरी की दुनियाँ में चमकता हुआ एक सितारा थीं, उन्होने अपने जमाने के कई मशहूर शायरों के साथ मुशायरों में हिस्सा लिया था.

परवीन शाकिर के कुछ कलाम 



इश्क़ के इस सफ़र ने

चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया
इश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया

ऐ मिरी गुल-ज़मीं तुझे चाह थी इक किताब की
अहल-ए-किताब ने मगर क्या तिरा हाल कर दिया

मिलते हुए दिलों के बीच और था फ़ैसला कोई
उस ने मगर बिछड़ते वक़्त और सवाल कर दिया

अब के हवा के साथ है दामन-ए-यार मुंतज़िर
बानू-ए-शब के हाथ में रखना सँभाल कर दिया

मुमकिना फ़ैसलों में एक हिज्र का फ़ैसला भी था
हम ने तो एक बात की उस ने कमाल कर दिया

मेरे लबों पे मोहर थी पर मेरे शीशा-रू ने तो
शहर के शहर को मिरा वाक़िफ़-ए-हाल कर दिया

चेहरा ओ नाम एक साथ आज न याद आ सके
वक़्त ने किस शबीह को ख़्वाब ओ ख़याल कर दिया

मुद्दतों बा'द उस ने आज मुझ से कोई गिला किया
मंसब-ए-दिलबरी पे क्या मुझ को बहाल कर दिया 

                                                    

                                                   ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की


कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की
उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की
कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की
तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की
उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की
अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की 


वही ख़्वाब अज़ाबों की तरह


गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह
दिल पे उतरेंगे वही ख़्वाब अज़ाबों की तरह
राख के ढेर पे अब रात बसर करनी है
जल चुके हैं मिरे ख़ेमे मिरे ख़्वाबों की तरह
साअत-ए-दीद कि आरिज़ हैं गुलाबी अब तक
अव्वलीं लम्हों के गुलनार हिजाबों की तरह
वो समुंदर है तो फिर रूह को शादाब करे
तिश्नगी क्यूँ मुझे देता है सराबों की तरह
ग़ैर-मुमकिन है तिरे घर के गुलाबों का शुमार
मेरे रिसते हुए ज़ख़्मों के हिसाबों की तरह
याद तो होंगी वो बातें तुझे अब भी लेकिन
शेल्फ़ में रक्खी हुई बंद किताबों की तरह
कौन जाने कि नए साल में तू किस को पढ़े
तेरा मेआ'र बदलता है निसाबों की तरह
शोख़ हो जाती है अब भी तिरी आँखों की चमक
गाहे गाहे तिरे दिलचस्प जवाबों की तरह
हिज्र की शब मिरी तन्हाई पे दस्तक देगी
तेरी ख़ुश-बू मिरे खोए हुए ख़्वाबों की तरह


मुझ में तेरा जमाल था क्या था

इक हुनर था कमाल था क्या था
मुझ में तेरा जमाल था क्या था
तेरे जाने पे अब के कुछ न कहा
दिल में डर था मलाल था क्या था
बर्क़ ने मुझ को कर दिया रौशन
तेरा अक्स-ए-जलाल था क्या था
हम तक आया तू बहर-ए-लुत्फ़-ओ-करम
तेरा वक़्त-ए-ज़वाल था क्या था
जिस ने तह से मुझे उछाल दिया
डूबने का ख़याल था क्या था
जिस पे दिल सारे अहद भूल गया
भूलने का सवाल था क्या था
तितलियाँ थे हम और क़ज़ा के पास
सुर्ख़ फूलों का जाल था क्या था 


मुझ पे एहसान हवा करती है


मुझ पे एहसान हवा करती है
चूम कर फूल को आहिस्ता से
मोजज़ा बाद-ए-सबा करती है
खोल कर बंद-ए-क़बा गुल के हवा
आज ख़ुश्बू को रिहा करती है
अब्र बरसते तो इनायत उस की
शाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है
ज़िंदगी फिर से फ़ज़ा में रौशन
मिशअल-ए-बर्ग-ए-हिना करती है
हम ने देखी है वो उजली साअत
रात जब शेर कहा करती है
शब की तन्हाई में अब तो अक्सर
गुफ़्तुगू तुझ से रहा करती है
दिल को उस राह पे चलना ही नहीं
जो मुझे तुझ से जुदा करती है
ज़िंदगी मेरी थी लेकिन अब तो
तेरे कहने में रहा करती है
उस ने देखा ही नहीं वर्ना ये आँख
दिल का अहवाल कहा करती है
मुसहफ़-ए-दिल पे अजब रंगों में
एक तस्वीर बना करती है
बे-नियाज़-ए-कफ़-ए-दरिया अंगुश्त
रेत पर नाम लिखा करती है
देख तू आन के चेहरा मेरा
इक नज़र भी तिरी क्या करती है
ज़िंदगी भर की ये ताख़ीर अपनी
रंज मिलने का सिवा करती है
शाम पड़ते ही किसी शख़्स की याद
कूचा-ए-जाँ में सदा करती है
मसअला जब भी चराग़ों का उठा
फ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है
मुझ से भी उस का है वैसा ही सुलूक
हाल जो तेरा अना करती है
दुख हुआ करता है कुछ और बयाँ
बात कुछ और हुआ करती है 


अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से




अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से
ज़मीं की ख़ैर माँगें आसमाँ से
अगर चाहें तो वो दीवार कर दें
हमें अब कुछ नहीं कहना ज़बाँ से
सितारा ही नहीं जब साथ देता
तो कश्ती काम ले क्या बादबाँ से
भटकने से मिले फ़ुर्सत तो पूछें
पता मंज़िल का मीर-ए-कारवाँ से
तवज्जोह बर्क़ की हासिल रही है
सो है आज़ाद फ़िक्र-ए-आशियाँ से
हवा को राज़-दाँ हम ने बनाया
और अब नाराज़ ख़ुशबू के बयाँ से
ज़रूरी हो गई है दिल की ज़ीनत
मकीं पहचाने जाते हैं मकाँ से
फ़ना-फ़िल-इश्क़ होना चाहते थे
मगर फ़ुर्सत न थी कार-ए-जहाँ से
वगर्ना फ़स्ल-ए-गुल की क़द्र क्या थी
बड़ी हिकमत है वाबस्ता ख़िज़ाँ से
किसी ने बात की थी हँस के शायद
ज़माने भर से हैं हम ख़ुद गुमाँ से
मैं इक इक तीर पे ख़ुद ढाल बनती
अगर होता वो दुश्मन की कमाँ से
जो सब्ज़ा देख कर ख़ेमे लगाएँ
उन्हें तकलीफ़ क्यूँ पहुँचे ख़िज़ाँ से
जो अपने पेड़ जलते छोड़ जाएँ
उन्हें क्या हक़ कि रूठें बाग़बाँ से 


पूरा दुख और आधा चाँद



पूरा दुख और आधा चाँद

हिज्र की शब और ऐसा चाँद

दिन में वहशत बहल गई

रात हुई और निकला चाँद
किस मक़्तल से गुज़रा होगा
इतना सहमा सहमा चाँद
यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तन्हा चाँद
मेरी करवट पर जाग उठ्ठे
नींद का कितना कच्चा चाँद
मेरे मुँह को किस हैरत से
देख रहा है भोला चाँद
इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्हा होगा चाँद
आँसू रोके नूर नहाए
दिल दरिया तन सहरा चाँद
इतने रौशन चेहरे पर भी
सूरज का है साया चाँद
जब पानी में चेहरा देखा
तू ने किस को सोचा चाँद
बरगद की इक शाख़ हटा कर
जाने किस को झाँका चाँद
बादल के रेशम झूले में
भोर समय तक सोया चाँद
रात के शाने पर सर रक्खे
देख रहा है सपना चाँद
सूखे पत्तों के झुरमुट पर
शबनम थी या नन्हा चाँद
हाथ हिला कर रुख़्सत होगा
उस की सूरत हिज्र का चाँद
सहरा सहरा भटक रहा है
अपने इश्क़ में सच्चा चाँद
रात के शायद एक बजे हैं
सोता होगा मेरा चाँद


टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या


टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या
बजते रहें हवाओं से दर तुम को इस से क्या
तुम मौज मौज मिस्ल-ए-सबा घूमते रहो
कट जाएँ मेरी सोच के पर तुम को इस से क्या
औरों का हाथ थामो उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊँ अपना ही घर तुम को इस से क्या
अब्र-ए-गुरेज़-पा को बरसने से क्या ग़रज़
सीपी में बन न पाए गुहर तुम को इस से क्या
ले जाएँ मुझ को माल-ए-ग़नीमत के साथ अदू
तुम ने तो डाल दी है सिपर तुम को इस से क्या
तुम ने तो थक के दश्त में खे़मे लगा लिए
तन्हा कटे किसी का सफ़र तुम को इस से क्या


इरादा नहीं किया

हम ने ही लौटने का इरादा नहीं किया
उस ने भी भूल जाने का वा'दा नहीं किया
दुख ओढ़ते नहीं कभी जश्न-ए-तरब में हम
मल्बूस-ए-दिल को तन का लबादा नहीं किया
जो ग़म मिला है बोझ उठाया है उस का ख़ुद
सर ज़ेर-ए-बार-ए-साग़र-ओ-बादा नहीं किया
कार-ए-जहाँ हमें भी बहुत थे सफ़र की शाम
उस ने भी इल्तिफ़ात ज़ियादा नहीं किया
आमद पे तेरी इत्र ओ चराग़ ओ सुबू न हों
इतना भी बूद-ओ-बाश को सादा नहीं किया 


क़ैद में गुज़रेगी जो उम्र बड़े काम की थी


क़ैद में गुज़रेगी जो उम्र बड़े काम की थी
पर मैं क्या करती कि ज़ंजीर तिरे नाम की थी
जिस के माथे पे मिरे बख़्त का तारा चमका
चाँद के डूबने की बात उसी शाम की थी
मैं ने हाथों को ही पतवार बनाया वर्ना
एक टूटी हुई कश्ती मिरे किस काम की थी
वो कहानी कि अभी सूइयाँ निकलीं भी न थीं
फ़िक्र हर शख़्स को शहज़ादी के अंजाम की थी
ये हवा कैसे उड़ा ले गई आँचल मेरा
यूँ सताने की तो आदत मिरे घनश्याम की थी
बोझ उठाते हुए फिरती है हमारा अब तक
ऐ ज़मीं-माँ तिरी ये उम्र तो आराम की थी


नई ख़ुशबू में लिखा चाहता है

हर्फ़-ए-ताज़ा नई ख़ुशबू में लिखा चाहता है
बाब इक और मोहब्बत का खुला चाहता है
एक लम्हे की तवज्जोह नहीं हासिल उस की
और ये दिल कि उसे हद से सिवा चाहता है
इक हिजाब-ए-तह-ए-इक़रार है माने वर्ना
गुल को मालूम है क्या दस्त-ए-सबा चाहता है
रेत ही रेत है इस दिल में मुसाफ़िर मेरे
और ये सहरा तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा चाहता है
यही ख़ामोशी कई रंग में ज़ाहिर होगी
और कुछ रोज़ कि वो शोख़ खुला चाहता है
रात को मान लिया दिल ने मुक़द्दर लेकिन
रात के हाथ पे अब कोई दिया चाहता है
तेरे पैमाने में गर्दिश नहीं बाक़ी साक़ी
और तिरी बज़्म से अब कोई उठा चाहता है 


समुंदरों के उधर से कोई सदा आई




समुंदरों के उधर से कोई सदा आई
दिलों के बंद दरीचे खुले हवा आई
सरक गए थे जो आँचल वो फिर सँवारे गए
खुले हुए थे जो सर उन पे फिर रिदा आई
उतर रही हैं अजब ख़ुशबुएँ रग-ओ-पै में
ये किस को छू के मिरे शहर में सबा आई
उसे पुकारा तो होंटों पे कोई नाम न था
मोहब्बतों के सफ़र में अजब फ़ज़ा आई
कहीं रहे वो मगर ख़ैरियत के साथ रहे
उठाए हाथ तो याद एक ही दुआ आई 


जब साज़ की लय बदल गई थी

जब साज़ की लय बदल गई थी
वो रक़्स की कौन सी घड़ी थी
अब याद नहीं कि ज़िंदगी में
मैं आख़िरी बार कब हँसी थी
जब कुछ भी न था यहाँ पे मा-क़ब्ल
दुनिया किस चीज़ से बनी थी
मुट्ठी में तो रंग थे हज़ारों
बस हाथ से रेत बह रही थी
है अक्स तो आइना कहाँ है
तमसील ये किस जहान की थी
हम किस की ज़बान बोलते हैं
गर ज़ेहन में बात दूसरी थी
तन्हा है अगर अज़ल से इंसाँ
ये बज़्म-ए-कलाम क्यूँ सजी थी
था आग ही गर मिरा मुक़द्दर
क्यूँ ख़ाक में फिर शिफ़ा रखी थी
क्यूँ मोड़ बदल गई कहानी
पहले से अगर लिखी हुई थी 



अगर आपके पास कोई सुझाव या कोई जानकारी है परवीन शाकिर से जुड़ी हुई तो कृपया Comment कीजिए जिससे  हम सुधार कर सकें धन्यवाद .

Biography of Amir Khusaro हज़रत अमीर खुसरो (अब्दुल हसन यमीनूद्दीन मूहोम्मद)



अमीर खुसरो




https://shakeeliyaat.blogspot.com/2019/09/biography-of-amir-khusaro.html


अमीर खुसरो के हिन्दवी कलाम की एकमात्र पांडुलिपि


जर्मनी (बर्लिन) के संग्रहालय स्टाट्स बिब्लिओथिक में रखी है।


https://shakeeliyaat.blogspot.com/2019/09/biography-of-amir-khusaro.html


हज़रत अमीर खुसरो



अब्दुल हसन यमीनूद्दीन मूहोम्मद ये पूरा नाम था हज़रत अमीर खुसरो का, इनकी पैदाइश सन 1253 ईसवी में एटा ज़िले में उत्तर प्रदेश के पटियाली में हुई, उनके वालिद का नाम अमीर मोहम्मद सैफुद्दीन। 13 वीं ईसवी के शुरुवाती दिनों में अमीरमूहोम्मद सैफुद्दीन तुर्किस्तान में लाचीन कबीले के सरदार हुआ करते थे. ये वो दौर था जब चंगेज़ ख़ानअपनी सरहदें मंगोल से निकाल कर आगे बढ़ा रहा था वो इस कदर ज़ालिम था के उसके आने की ख़बर सुनते ही लोग अपने घर बार छोड़ का भाग जया करते थे उस वक़्त दिल्ली के तख़्त पर शमशुद्दीन अलतमश तख़्तनशीं था चंगेज़ ख़ान से बचने के लिए अमीर मोहम्मद सैफुद्दीन अपने काबलिए वालों के साथ लाहौर से होते हुए दिल्ली (देहली) आ गए. खुशकिस्मती से उनकी पहुँच शमशुद्दीन अलतमश के दरबार तक हो गई। अपने फौजी हुनर की बदौलत वो दरबार में फ़ौजियों के सरदार बना दीये गए. शमशुद्दीन अलतमश के बाद बहुत ही नेक और अमनपसंद बादशाह नसीरुद्दीन महमूद के यहाँ इनको नौकरी करने का मौका मिला। फिर उस दौर के बहुत ही मशहूर बादशाह बलबन ने उन्हे आमिर का ओहदा दिया और ज़िला पटियाली में एटा के पास जागीरदारी भी दी.

दिल्ली के एक राइस आमिर एमादूल्मुल्क जो बलबन के दरबार में एक खास ओहदे पर थे अपनी किसी मजबूरी की वजह से इन्होंने इस्लाम कुबलू कर लिया था. इस्लाम कुबूल करने के बावजूद भी इनके घर के सारे रिवाज हिंदुओं के थे, इन्ही की लड़की से अमीर खुसरो की शादी हुई। खुसरो का बचपन हिन्दू और मुस्लिम तहज़ीबों के बीच बिता उनके ज़ेहन पर इसकी छाप ज़िंदगी भर देखी गयी खुसरो जब पैदा हुए तो उन्हे उनके वालिद कपड़े में लपेट कर एक सूफी के पास लेकर , उन्होने सैफुद्दीन के हाथ से खुसरो को आपने हाथ में लेकर कहा "आवरदी कसे राके दो कदम। अज़ खाकानी पेश ख्वाहिद बूद।" जिसका मतलब है तुम मेरे पास ऐसे बच्चे कू लेकर आए हो की जिसका नाम दुनियाँ में तब तक रहेगा जब तक दुनियाँ रहेगी और इसका मुस्तकबिल बहुत बुलंद होगा और किस्मत इसके क़दम चूम कर खुद पर इतरायगी। अमीर खुसरो 3 भाई थे तीनों भाइयों में अमीर खुसरो सबसे ज़्यादा तेज़ थे अपनी एक किताब गुर्रतल कमाल में अमीर खुसरो ने ज़िक्र किया है की उनके वालिद मोहम्मद सैफुद्दीन “उम्मी” यानी अनपढ़ थे, मगर उन्होने अमीर खुसरो की तालिम का बहुत ही अच्छा इंतजाम किया उनकी शुरुवाती तरबियत मदरसे में हुई. खुसरो कहते हैं की जब उन्होने होश संभाला तो खुद को मदरसे में उनदिनों लिखावट पर काफी ज़ोर दिया जाता था जिसके लिए वो क़ाज़ी असदुद्दीन मूहोम्मद के पास जया करते थे अमीर खुसरो की लिखावट बहुत ही खूबसूरत थी, अमीर खुसरो को शायरी का शौक बचपने से लग गया था कहा जाता है की उन्होने अपना पहला दीवान 9 साल की उम्र मे ही लिख लिया था, उनके नाना को पान खाने का शौक था और उनके ननिहाल में नाच गाने का चलन था जो की मुस्लिम घरानो में नहीं हुआ करता दो तरह के खानदानों का नन्हें खुसरो के दिमाग पर गहरा असर हुआ वो जहां फारसी में कलाम करते वहीं वो फारसी के कलाम में हिन्दी की खड़ी बोली का भी इस्तमाल भी खूब किया करते। खुसरो ने अपने एक फ़ारसी दीवान तुहफतुसिग्र में कहा की उनके उस्ताद क़ाज़ी असदुद्दीन मूहोम्मद ने उमने अदब और शायरी के बेपनाह शौक और उनकी सलाहियत को देखते हुए उन्हे अपने साथ नायाब कोतवाल के पास ले गए. वहाँ एक और जाने माने और मशहूर अदीब ख़वाजा इज्जुद्दीन (अज़ीज़) बैठे हुए थे। क़ाज़ी असदुद्दीन मूहोम्मद ने उनसे खुसरो का इम्तेहान लेने को कहा। तब ख्वाजा साहब ने कहा ख्वाजा साहब ने तब अमीर खुसरो से कहा कि 'मू' (बाल, 'बैज,अंडा,'तीर' और 'खरपुजा') (खरबूजा- इन चार बेजोड़, बेमेल और बेतरतीब चीज़ों को एक अशआर में इस्तमाल करो। खुसरो ने फौरन इनसब से फ़ारसी का एक कलाम कह दिया.

'हर मूये कि दर दो जुल्फ़ आँ सनम अस्त,

सद बैज-ए-अम्बरी बर आँ मूये जम अस्त,

चूँ तीर मदाँ रास्त दिलशरा जीरा,

चूँ खरपुजा ददांश मियाने शिकम् अस्त।'




यानि उस महबूबा के बालों में जो तार हैं उनमें से हर एक तार में अम्बर मछली जैसी सुगन्ध वाले सौ-सौ अंडे पिरोए हुए हैं। उस सुन्दरी के हृदय को तीर जैसा सीधा-सादा मत समझो व जानो क्योंकि उसके भीतर खरबूजे जैसे चुभनेवाले दाँत भी मौजूद हैं।

इसका मतलब है :- उस महबूब के बालों में जो तार है उनमे से हर एक तार में आसमान मछ्ली जैसी खुशबू वाले सौ- सौ अंडे पिरोए हुए है। उस खूबसूरत के दिल को तीर जैसा सीधा साधा म्मत समझो जानो क्योंकि उसके अंदर खरबूज़ जैसे चुभने वाले दाँत भी मौजद हैं.

ख़्वाजा साहब को उम्मीद न थी की कोई इन बेतरतीब से हर्फों से कोई किसी तरह का कलाम भी कह सकता है मगर खुसरो का कलाम सून का ख़्वाजा साहब चौंक गए और उन्होने आगे बढ़ के खुसरो को गले से लगा लिया और कहा अदब की दुनियाँ में तुम्हारा नाम “सुल्तानी” होना चाहिए। यही वजह है की खुसरो के 'तोहफतुसिग्र' दीवान मे अक्सर जगह पर यही नाम उन्होने इस्तमाल किया है , खुसरो का मन कभी भी पढ़ाई लिखाई में नहीं लगा वो हमेशा शेर-ओ – शायरी में डूबे रहते वो बहुत खुशदिल थे उन्हे तनहानियाँ पसंद थी, वो कभी वो नहीं करना चाहते थे जो आम लोग किया करते हैं वो कुछ खास की तलाश में रहते और उनके साथ ऐसा हुआ भी।

खुसरो के नाना एमादूल्मुल्क और उनके वालिद जनाब मोहम्मद सैफुद्दीन चिश्तीया घराने के मशहूर और बहुत पहुंचे हुए फकीर “हज़रत निजामुद्दीन औलिया उर्फ़े सुल्तानुल मशायख” के मुरीद थे। दोनों खुसरो और उनके भाइयों के लेकर उनके ख़ानक़ाह में पहुंचे , उस वक़्त खुसरो की उम्र महज़ 7 साल की थी खुसरो को पता चल गया की वो उन्हे वहाँ मुरीद कराने के लिए ले कर आए हैं। खुसरो ने अपने वालिद से कहा की अभी मेरा इरादा मुरीद होने का नहीं है इसलिए मैं ख़ानक़ाह के अंदर नहीं जाऊंगा आप ही अंदर जाइए, नन्हा खुसरो ये सोच रह था की अगर हज़रत निज़्जमुद्दीन इतने बड़े सूफी हैं तो मैं खूद ही मुरीद हो जाऊंगा. जब उनके वालिद ख़ानक़ाह के अंदर दाखील हो गए तब बैठे बैठे बाहर ही उन्होने एक शेर कहा की अगर वो दिल की बात समझ जाते हैं तो वो मेरे दिल की बात भी समझ जायेंगे और मेरे शेर का जवाब शेर से देंगे तभी मैं अंदर जाऊंगा और मुरीद हो जाऊंगा। उन्होने कहा-




'तु आँ शाहे कि बर ऐवाने कसरत,

कबूतर गर नशीनद बाज गरदद।

गुरीबे मुस्तमंदे बर-दर आमद,

बयायद अंदर्रूँ या बाज़ गरदद।।'




मतलब :- तू वो शहंशाहों का शहँशाह है की तेरे पास कबूतर भी बैठे तो वो तेरी इनायत से बाज बन जाए॥ खुसरो अभी मन में ये सोच ही रहे थे की अंदर से एक खादिम आए और उन्होने ये शेर पढ़ा.




'बयायद अंद र्रूँ मरदे हकीकत,

कि बामा यकनफस हमराज गरदद।

अगर अबलह बुअद आँ मरदे - नादाँ।

अजाँ राहे कि आमद बाज गरदद।।'




मतलब :- ए हक़ (ख़ुदा) की तलाश करने वाले, अंदर चले आओ और मेरे साथ तुम भी उस (ख़ुदा) की तलाश करो। और गर आने वाला अंजान है तो जिस रास्ते से आया है वो वापस उसी रास्ते से चला जाए. जैसे ही खुसरो ने ये सुना वो रोने लगे और बदहवास होकर अंदर गए और निज़ामुद्दीन औलिया के कदमों पर सर रख कर बेसाख्ता रोने लगे, और तुरंत ही वो मुरीद हो गए। ये किस्सा हसन सानी निजामी ने अपनी किताब “तजकि-दह-ए-खुसरवी” में लिखी है. जब खुसरो अपने घर पहुंचे तो तो वो जैसे मदहोशी के आलम में थे वो अपनी माँ के सामने झूम झूम के गुनगुना रहे थे।आज क़व्वाली और बहुत से भारतीय संगीत शैलियों में जो अक्सर गया जाता है वो इसी आलम का कलाम है और ये आज भी बहुत मशहूर है –







"आज रंग है ऐ माँ रंग है री, मेरे महबूब के घर रंग है री।

अरे अल्लाह तू है हर, मेरे महबूब के घर रंग है री।

मोहे पीर पायो निजामुद्दीन औलिया,

निजामुद्दीन औलिया-अलाउद्दीन औलिया।

अलाउद्दीन औलिया, फरीदुद्दीन औलिया,

फरीदुद्दीन औलिया, कुताबुद्दीन औलिया।

कुताबुद्दीन औलिया मोइनुद्दीन औलिया,

मुइनुद्दीन औलिया मुहैय्योद्दीन औलिया।

आ मुहैय्योदीन औलिया, मुहैय्योदीन औलिया।

वो तो जहाँ देखो मोरे संग है री।

अरे ऐ री सखी री, वो तो जहाँ देखो मोरो (बर) संग है री।

मोहे पीर पायो निजामुद्दीन औलिया, आहे, आहे आहे वा।

मुँह माँगे बर संग है री, वो तो मुँह माँगे बर संग है री।

निजामुद्दीन औलिया जग उजियारो, जग उजियारो जगत उजियारो।

वो तो मुँह माँगे बर संग है री। मैं पीर पायो निजामुद्दीन औलिया।

गंज शकर मोरे संग है री। मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखयो सखी री।

मैं तो ऐसी रंग। देस-बदेस में ढूढ़ फिरी हूँ, देस-बदेस में।

आहे, आहे आहे वा, ऐ गोरा रंग मन भायो निजामुद्दीन।

मुँह माँगे बर संग है री। सजन मिलावरा इस आँगन मा।

सजन, सजन तन सजन मिलावरा। इस आँगन में उस आँगन में।

अरे इस आँगन में वो तो, उस आँगन में। अरे वो तो जहाँ देखो मोरे संग है री।

आज रंग है ए माँ रंग है री। ऐ तोरा रंग मन भायो निजामुद्दीन।

मैं तो तोरा रंग मन भायो निजामुद्दीन। मुँह माँगे बर संग है री।

मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखी सखी री।

ऐ महबूबे इलाही मैं तो ऐसो रंग और नहीं देखी।

देस विदेश में ढूँढ़ फिरी हूँ।

आज रंग है ऐ माँ रंग है ही।

मेरे महबूब के घर रंग है री।




सन 1264 में जब मूहोम्मद सैफुद्दीन एक जंग में शहीद हुए और इस फ़ानी दुनियाँ को अलविदा कह गए तब नन्हें खुसरो की उम्र महज़ 7 साल की थी, उनके परवरिश की ज़िम्मेदारी अब नाना अमीर नवाब एमादुलमुल्क के ऊपर आ गयी नाना ने खुसरो को ऐसी तरबियत दी की वो हर मैदान में कामयाब हो सकते थे उनकी पढ़ाई लिखाई का बंदोबस्त किया गया और नाना जो खुद भी एक बहुत बहादुर फौजी थे। और उन्होने भी अपने हुनर का जौहर कई जंगों में दिखाया था, उन्होने खुसरो को जंग के सारे हुन्नर सिखाये और खुसरो एक बेहद तेज़ और सख्त फौजी बन गए. एमादुलमुल्क अक्सर खुसरो को समझाया करते थे की डरपोक और कमज़ोर सिपाही अपने वतन के ग़द्दार के जैसा होता है. यही वो दौर था जब खुसरो को बड़े बड़े बादशाहों और दानिश्वरों(बुद्धिजीवियों) की सोहबत में रहने का मौका मिला और उनके दोनों शौक शायरी और सियासत को नया आयाम मिला। खुसरो को बचपने से ही शायरी का शौक था,

जब वो जवानी की दहलीज़ पर थे तो उन्होने उस दौर के बड़े शायरों को पढ़ना शुरू किया और उनकी सोहबत से खुद को तराशते रहे। महज़ 20 साल (सन 1271) की कम उम्र में उन्होने अपना पहला दीवान लिखा “तुहफतुसिग्र” ये दीवान उस दौर के फ़ारसी के जाने माने शायरों अनवरी, खाकानी, सनाई से मुतासीर (प्रभावित) हो कर खुसरो ने लिखी.


हुदहुद और खुसरो



जल्लालुद्दीन खिलजी सन 1290 में दिल्ली की तख़्त पर तख़्तनशीं हुआ, खुसरो से खिलजी की जान पहचान पहले से ही थी खिलजी ने भी खुसरो को बहुत बड़ा ओहदा दिया अपने दरबार में और वो खुसरो को प्यार से हुदहुद कह कर पुकारा करते थे जिसका मतलब है सुरीली आवाज़ निकालने वाली चिड़िया. खिलजी ने ही खुसरो को आमिर का खिताब दिया तो बहरहाल अब अब्दुल हसन यमुनूद्दीन आमिर खुसरो के नाम से जाने जाने लगे। खुसरो ने खिलजी के शान में कई कलाम लिखे इसमें से सबसे ज़्यादा शोहरत मिली “मफ़्तहुल फतेह” इसमे खुसरो ने खिलजी के 4 जंगों का ज़िक्र किया है जब खिलजी 36 साल का था तो उसने कैसे अपने दुश्मनों का खात्मा किया उसमें ज़िक्र है कैसे उसने कैसे मलिक छजजु की बगावत को रौंदा और कैसे उसको सज़ा दी,अवध की जीत, मुग़लों को कैसे खिलजी ने हराया और छाईन की जीत का ज़िक्र किया है. खिलजी ने खुसरो को मुसहफदार (लाइब्रेरियन) और शाही कुरान शरीफ का देख रेख का जिम्मा भी दिया.

ज़ीराउद्दीन बरनी जो की उस वक़्त के इतिहास कर थे कहते हैं की खुसरो बादशाहों की महफ़िलों में जया करते थे जहां शराब के कई-कई दौर चला करते नाच गाना होता और खुसरो अपनी ग़ज़ल सुनाया करते मगर कभी भी उन्होने शराब को हाथ नहीं लगाया और वो अपनी सूफियाना फितरत में रहते और कसरत से रोजाना रात होते ही हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के ख़ानक़ाह में जाया करते थे.


तलवार और साज़ों की झंकार



इस बीच मालवा के चित्तौड़ में रन्थंबौर में बगावत की खबरें आने लगी तब उस उम्र में भी खिलजी ने खुद बगावत को कुचलने का इरादा किया उधर खुसरो को बुलाया कहा कहाँ हमारा हुदहुद खुसरो को बुलाया गया खिलजी ने कहा हम जंग करने जा रहे हैं, और चाहते हैं की तुम भी साथ चलो हमारे हम चाहते हैं तलवार और साज़ों की झंकार हमारे साथ रहे, खुसरो क्या तुम हमारे साथ चलोगे खुसरो ने कहा जनाब मैं आपके साथ ज़रूर जाऊंगा और आपके साथ साये की तरह रहूँगा और जो अपनी आँखों से देखुंगा वो लिखुंगा ताकि आने वाली दुनियाँ उसको अपनी आँखों से देखे की मैदान-ए-जंग में क्या हुआ था। और मैदान-ए-जंग में आपको ऐसा नहीं महसूस नहीं होगा की कोई शायर कलम चला रहा है वो एक खूंखार फौजी की तरह तलवार चलता नज़र आयगा। और जब तलवारों की बेसुरी आवाज़ थम जाया करेगी मैं आपको सुरों और साज़ों की सुरीली तान सुनाया करूंगा. ये सून कर खिलजी बहुत खुश हुआ और उसने कहा शाबबाश खुसरो आज से हम तुम्हें आमिर का खिताब देता है और 12000 तनगा तुम्हारी सालाना तंख्वाह मुकर्रर करते हैं।


हे लक्ष्मी सब तेरी माया है



सन 1296 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने तख़्त के लालच में अपने ही चाचा का क़त्ल कर दिया और दिल्ली के तख़्त पर कब्ज़ा कर लिया, उस वक़्त इतिहासकार के नाते खुद अमीर खूसरो ने इस वाक़ये का ज़िक्र कुछ यूं किया था. "अरे कुछ सुना अलाउद्दीन खिलजी सुलतान बन बैठा। सुलतान बनने से पहले इसने क्या-क्या नए करतब दिखाए। हाँ वहीं कड़ा से देहली तक सड़क के दोनों तरफ़ तोपों से दीनार और अशर्किफ़याँ बाँटता आया। लोग कहते हैं अलाउद्दीन ख़ून बरसाता हुआ उठा और ख़ून की होली खेलता हुआ तख़ते शाही तक पहुँच गया। हाँ भई, खल्के खुदा को राजा प्रजा को देखो। लोग अशर्फ़ियों के लिए दामन फैलाए लपके और ख़ून के धब्बे भूल गए। हे लक्ष्मी सब तेरी माया है।"

अमीर खुसरो और अलाउद्दीन खिलजी


अलाउद्दीन खिलजी वैसे तो रिश्ते में जलालूद्दीन का भतीजा भी और उसका दामाद भी था, मगर तख़्त के लालच में उसने अपने चाचा का ही क़त्ल कर दिया। मगर वो खुसरो के साथ बहुत अच्छा बरताव करता था, खुसरो ने उस दौर का आँखों देखा हाल अपनी किताब “खजाइनुल फतूह” सन 1295 से सन-1311 ई. तक के जंगों में फतेह का ज़िक्र किया है. इसके अलावा खुसरो ने अपनी तरफ से सनकी,ज़ालिम जिद्दी और ग़ैरमज़हबी बादशाह अलाउद्दीन को अपनी रियाया से अच्छा सलूक करने का सुझाव देते रहते थे, एक जगह खुसरो ने लिखा है की जब ख़ुदा ने तुझे शाही तख़्त दिया है तो तेरा भी फर्ज़ है की तू भी रियाया का पूरा ख़्याल रख, जिससे तू भी खुश रहे और ख़ुदा भी खुश रहे.

खुसरो का कलाम 


खुसरो के कलाम में जैसे देखने को मिलता है हिन्दी और फ़ारसी का इस्तमाल वैसे ही वो हिन्दू और मुस्लिम दोनों मज़हबों में आपसी मेल चाहते थे, उन्होने कभी किसी में कोई फर्क नहीं किया जात पात उंच नीच से वो परे रहे उम्र भर जितना उनका मुस्लिमों से रिश्ता रहा उतना ही दूसरे मज़हबों में भी रहा उनकी परवरिश भी कुछ इसी तरह की गयी थी. खुसरो ने मज़हबी बुराइयों और भेद भाव से अलग सूफी सोच का सहारा लिया ज़िंदगी को समझने के लिए, और हिन्दी में तरह तरह के बसंत, सावन, बरखा, पनघट, हिंडोला (झूला), होली, चक्की, शादी-ब्याह, विदाई, साजन, बाबुल, मंढा, ईश अराधना आदि गीत लिखे तथा दोहे, गजल, कव्वाली व तरह-तरह की पहेलियाँ लिखी।

अमीर खुसरो की शोहरत


खुसरो ने ही सितार, ढ़ोलक और तबले का आविष्कार किया, हिंदुस्तानी संगीत में तराना का भी आविष्कार खुसरो ने ही किया। खुसरो ने ईरानी संगीत और हिंदुस्तानी संगीत से मिलककर कई हज़ार रागों का आविष्कार किया जैसे जैसे - कौल, कल्बाना, साजगिरी, फरगाना, इशाक, तवाफिक, नौरोज कबीर, जिलफ, सनम-गनम, शहाना, अडाना, वगैरह ध्रपद गायकी की जगह अमीर खुसरो ने ख्याल गायन शैली का अविष्कार किया।खुसरो ने पुरानी कव्वाली और गजल को एक नया गाने का अंदाज दिया। किताबों में प्राक्कथन या प्रस्तावना लिखने का चलन भी खुसरो ने शुरु किया। अमीर खुसरो ने फारसी-हिन्दवी का प्रथम शब्द कोष 'खालिक बारी' लिखा और वो भी कविता के रुप में।


Biography of Jaun Elia | jaun elia love | jaun elia wife | jaun elia poetry

मैं जो हूँ जौन एलिया हूँ जनाब   मेरा बेहद लिहाज कीजिएगा कौन थे जौन   जौन एलिया जिसने न सिर्फ शायरी लिखी बल्कि उस शायरी का एक एक शेर जी कर ...